भुजरियां पर्व धूमधाम से मनाया क़स्बा सांचेत में सदियों से चली आ रही परम्परायें आज भी बरकरार है

August 12, 2022 Satish Maithil
सांचेत क़स्बा सांचेत में कुछ परम्परायें है जो की पूरे भारत में कही भी नहीं है
सेन समाज के लोगो की परम्परा जो की कही नहीं
क़स्बा सांचेत निवासी बलवीर सेन ने वताया की हमारे द्वारा भुजरिया पर्व पर सभी लोगो को दर्पण दिखाने की परम्परा है हम लोगों को भुजरिया पर्व पर ग्राम के सभी लोगों को कांच दिखाते है और लोग हमें पैसा देते है और लोगों को इस दिन कांच देखने से आँखों की रौशनी भी बढ़ ती है और सांथ ही आंखे कभी नहीं आती है यह परम्परा हमारे पूर्वजों से चली आ रही है और आज हम भी इस परम्परा को निभा रहे है.

महाराज समाज की परम्परा
क़स्बा सांचेत निवासी पंडित अरुण कुमार शास्त्री ने वताया सभी पंडितो द्वारा क़स्बा सांचेत में घर घर दुकान दुकान जाकर ग्राम के सभी लोगो को राखी बाँधी जाती है


एक साथ एक जुट होकर भुजरिया विसर्जन करने की परम्परा
क़स्बा सांचेत के बुजुर्ग राधेश्याम शर्मा और देवी सिंह चौहान वताते है की सांचेत में सबसे पहले माँ खेड़ापति माता मन्दिर में सभी लोगो द्वारा भुजरिया एकट्ठी की जाती है फिर इसके वाद श्री रामजानकी मन्दिर पर भुजरियों को इकठा किया जाता इसके वाद परम्परा गत पूरा गांव जिसकी आवादी पांच हजार है सभी लोग एक साथ होकर भुजरियां नदी में ले जाकर विसर्जन करते है.
जनप्रतिनिधि पहुंचे भुजरियां विसर्जन के दौरान
जिसमें भाजपा के बरिष्ठ नेता पूर्व सरपंच देवकीशन शर्मा नए सरपंच कल्याण सिंह लोधी मेहंबर व्रजमोहन सेन रामकिशन मिरैया मोहन चेयरमेन मुन्ना विश्वकर्मा बलवीर विश्वकर्मा आदि

धूमधाम से मना भुजरिया पर्व, बहनों ने भुजरिया देकर लिया रक्षा का वचन
रक्षाबंधन के दूसरे दिन भुजरियों का पर्व धूमधाम से मनाया गया। बहनों ने तालाबों पर पहुंचकर भुजरियों को धोकर उन्हें भगवान को अर्पित किया। इसके बाद उन्होंने एक दूसरे को भुजरियां बांटी। इसके अलावा बहनों ने भाइयों को भुजरियां दी। भाइयों ने बहनों को उनकी रक्षा करने का वचन दिया, जबकि बुजर्गो ने भुजरियां देने वाली बहन-बेटियों को उपहार दिए।
रक्षाबंधन के दूसरे दिन अच्छी फसल और बारिश की कामना के लिए भुजरियों का पर्व मनाया जाता है। भुजरियों के पर्व पर महिलाएं श्रावण मास में घर के अंदर मिट्टी में गेंहू व धान के बीज डालती हैं। रक्षाबंधन तक यह बीज उग आते हैं और इनका आकार करीब 6 इंच के लगभग हो जाता है। इन धान और गेंहू के पौधों को महिलाएं सरोवरों और कुओं के पानी से धोकर उन्हें सर्वप्रथम भगवान को अर्पित करती हैं। इसके बाद मोहल्लों और कॉलोनियों में प्रत्येक घर और व्यक्ति को एक-एक पौधा वितरित किया जाता है। पौधे लेने वाले भाई बहनों को उनकी रक्षा का वचन देते हैं जबकि बुजुर्ग बहन बेटियों को उपहार देते हैं। बहनों ने पलकमती नदी में भुजरियों को विसर्जन किया।

भुजरिया मेले में होती थी साहसिक प्रतियोगिताएं
भुजरिया पर्व भारत में सैकड़ों सालों से मनाया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में इस पर्व का आयोजन गांव के पास बने तालाब पर किया जाता है। तालाबों पर ही विभिन्न प्रकार के साहसिक प्रतियोगिताओं का भी आयोजन होता है, जिसमें युवक भाग लेते हैं। भुजरियों के पर्व पर ग्रामीण क्षेत्र में पहले निशानेबाजी, कुश्ती, पहलवानी, आदि का आयोजन किया जाता था। इसमें ग्रामीण बंदूकों, धनुषबाण, आदि से निशाने लगाते थे।
नवयुवतियां मनाती हैं पर्व
भुजरियों का पर्व नवयुवतियों का त्योहार माना जाता है, इस पर्व में जो युवतियां शादी के योग्य हो जाती हैं वह अपने घर में भुजरियों को बोती हैं और वह गांवों के युवकों को भाई मान कर उनकी सुख समृद्घि के लिए भुजरियां देती हैं।

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