एडिटर इन चीफ अभिषेक मालवीय 7477071513
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय मनंसापूर्ण हनुमान मंदिर के पास स्थित सेवा केंद्र द्वारा ब्रह्माकुमारीज की मुख्य प्रशसासिका राजयोगिनी दादी हृदय मोहिनी जी का द्वितीय पुण्यतिथि दिव्यता दिवस के रूप में मनाया गया। ब्रह्माकुमारी रेखा दीदी ने बताया कि 18 जनवरी, 1969 को संस्था के संस्थापक ब्रह्मा बाबा के अव्यक्त होने के बाद परमात्म आदेशानुसार दादी
हृदयमोहनी जी ने परमात्म संदेश वाहक और दूत बनकर लोगों के लिए आध्यात्मिक ज्ञान और दिव्य प्रेरणा देने की भूमिका निभाई। दादीजी ने 2016 तक संस्थान के मुख्यालय माउंट आबू में हर वर्ष आने वाले लाखों
भाई-बहनों को परमात्मा का दिव्य संदेश देकर योग-तपस्या बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। अपर सत्र न्यायाधीश विनोद कुमार शर्मा जी ने दादी जी की विशेषताओं का वर्णन करते हुए बताया कि एक बार चर्चा के दौरान दादीजी ने बताया था कि जब मैं मन की शक्ति से वतन में जाती हूं तो आत्मा तो शरीर में रहती है, लेकिन मुझे इस शरीर का भान नहीं रहता है। उस दौरान मेरे द्वारा जो वचन उच्चारित होते हैं वह भी मुझे याद नहीं रहते हैं। दादी हृदयमोहिनी जी ने 14 वर्ष तक बाबा के सानिध्य में रहकर कठिन योग-साधना की। इन दिनों में खाने-पीने को छोड़कर दिन व रात योग-साधना में वह लगी रहती थीं। इसके साथ ही बाबा एक-एक सप्ताह का मौन कराते थे, तभी से दादीजी का स्वभाव बन गया था कि जितना काम हो, वे उतना ही बात करती थीं।अंत समय तक वह अधिकाधिक मौन में रहीं। दादीजी को नॉर्थ उड़ीसा विश्व विद्यालय,बारीपाड़ा ने डी.लिट (डॉक्टर ऑफ लिटरेचर) की उपाधि से विभूषित
किया है। दादीजी को यह उपाधि उड़ीसा में प्रभु के सिंदेशवाहक के रूप में लोगों में आध्यात्मिकता का प्रचार-प्रसार करने और समाजसेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने हेतु प्रदान की गई। ब्रह्माकुमारीज़ से देश-विदेश में जुड़े 12 लाख भाई-बहनों और 46 हजार समर्पित ब्रह्माकुमारी बहनों की
दादीजी आदर्श थीं। उनके द्वारा उच्चारित एक-एक शब्द लाखों लोगों के जीवन को बदलने और आगे बढ़ाने के लिए वरदानी बोल होते थे। अस्वस्थ होने के बाद भी दादीजी अंतिम समय तक लोगों को प्रेरित करती
रहीं। दादीजी कहती थीं कि परेशान होने के पांच शब्द हैं- पहला है क्यों... क्यों कहा और व्यर्थ संकल्पों
की क्यू चालू हो जाती है, इसने ये कहा, उसने ये कहा और मन में व्यर्थ संकल्प चालू हो जाते हैं। क्योंकि जो बीत चुका वह हमारे हाथ में नहीं है। फ्यूचर ही हमारे हाथ में है। क्यों, क्या, कौन, कब और कैसे... ये पांच शब्द हमें परेशान करते हैं। खुशी के जाने के यह पांच शब्द ही हैं।
हर कार्य में सफल होने का एक ही मूलमंत्र है- दृढ़ता। यदि जीवन में दृढ़ता है तो सफलता निश्चित है, हुई पड़ी है। इसलिए प्लानिंग करके उसे पूरा करने के लिए दृढ़ संकल्प करें। मेरे जीवन का अनुभव
है कि जो भी कार्य किया है वह दृढ़ता के साथ किया है और सदा सफलता भी मिली है। दृढ़ता रूपी चाबी को हमेशा सम्भाल कर रखें।
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